Monday, November 14, 2016

माशूक न सही, चमकता चाँद ही सही
हमसफ़र न सही बस, दीदार ही सही।
आया है, फलक में अंधियारा मिटाने
माशूक भी आएगी थोड़ा इंतज़ार ही सही।

Friday, October 9, 2015

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,

मुहाजिरनामा , मुनव्वर राना  द्वारा 1947 के भारत पाकिस्तान बटवारे के मुहाजिरों पर लिखी गयी एक बहुत ही शसक्त ग़ज़ल हैं। यह एक बहुत लम्बी ग़ज़ल हैं जिसमे कि 504 शेर हैं। अपनी जमीन, अपना घर, अपने लोगो को छोड़ने का गम क्या होता हैं इसको इस ग़ज़ल में बड़ी शिद्द्त से व्यक्त किया गया हैं।
आप सभी के लिए इस के 50 शेर

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,

तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं ।



कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है,

कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं ।



नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में,

पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं ।



अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी,

वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं ।



किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी,

किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं ।



पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से,

निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं ।



जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,

वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।



यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद,

हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं ।



हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है,

हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं ।



हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है,

अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं ।



सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे,

दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं ।



हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं,

अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं ।



गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,

इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं ।



हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की,

किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं ।



कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं,

के हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं ।



शकर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी,

के हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं ।



वो बरगद जिसके पेड़ों से महक आती थी फूलों की,

उसी बरगद में एक हरियल का जोड़ा छोड़ आए हैं ।




अभी तक बारिसों में भीगते ही याद आता है,

के छप्पर के नीचे अपना छाता छोड़ आए हैं ।




भतीजी अब सलीके से दुपट्टा ओढ़ती होगी,

वही झूले में हम जिसको हुमड़ता छोड़ आए हैं ।




ये हिजरत तो नहीं थी बुजदिली शायद हमारी थी,

के हम बिस्तर में एक हड्डी का ढाचा छोड़ आए हैं ।




हमारी अहलिया तो आ गयी माँ छुट गए आखिर,

के हम पीतल उठा लाये हैं सोना छोड़ आए हैं ।



महीनो तक तो अम्मी ख्वाब में भी बुदबुदाती थीं,

सुखाने के लिए छत पर पुदीना छोड़ आए हैं ।



वजारत भी हमारे वास्ते कम मर्तबा होगी,

हम अपनी माँ के हाथों में निवाला छोड़ आए हैं ।



यहाँ आते हुए हर कीमती सामान ले आए,

मगर इकबाल का लिखा तराना छोड़ आए हैं ।



हिमालय से निकलती हर नदी आवाज़ देती थी,

मियां आओ वजू कर लो ये जूमला छोड़ आए हैं ।



वजू करने को जब भी बैठते हैं याद आता है,

के हम जल्दी में जमुना का किनारा छोड़ आए हैं ।



उतार आये मुरव्वत और रवादारी का हर चोला,

जो एक साधू ने पहनाई थी माला छोड़ आए हैं ।



जनाबे मीर का दीवान तो हम साथ ले आये,

मगर हम मीर के माथे का कश्का छोड़ आए हैं ।



उधर का कोई मिल जाए इधर तो हम यही पूछें,

हम आँखे छोड़ आये हैं के चश्मा छोड़ आए हैं ।



हमारी रिश्तेदारी तो नहीं थी हाँ ताल्लुक था,

जो लक्ष्मी छोड़ आये हैं जो दुर्गा छोड़ आए हैं ।


गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,

इलाहाबाद में कैसा नाज़ारा छोड़ आए हैं ।



कल एक अमरुद वाले से ये कहना गया हमको,

जहां से आये हैं हम इसकी बगिया छोड़ आए हैं ।



वो हैरत से हमे तकता रहा कुछ देर फिर बोला,

वो संगम का इलाका छुट गया या छोड़ आए हैं।


अभी हम सोच में गूम थे के उससे क्या कहा जाए,

हमारे आंसुओ ने राज खोला छोड़ आए हैं ।



मुहर्रम में हमारा लखनऊ इरान लगता था,

मदद मौला हुसैनाबाद रोता छोड़ आए हैं ।



जो एक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,

वहीँ हसरत के ख्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।



महल से दूर बरगद के तलए मवान के खातिर,

थके हारे हुए गौतम को बैठा छोड़ आए हैं ।



तसल्ली को कोई कागज़ भी चिपका नहीं पाए,

चरागे दिल का शीशा यूँ ही चटखा छोड़ आए हैं ।



सड़क भी शेरशाही आ गयी तकसीम के जद मैं,

तुझे करके हिन्दुस्तान छोटा छोड़ आए हैं ।



हसीं आती है अपनी अदाकारी पर खुद हमको,

बने फिरते हैं युसूफ और जुलेखा छोड़ आए हैं ।



गुजरते वक़्त बाज़ारों में अब भी याद आता है,

किसी को उसके कमरे में संवरता छोड़ आए हैं ।


हमारा रास्ता तकते हुए पथरा गयी होंगी,

वो आँखे जिनको हम खिड़की पे रखा छोड़ आए हैं ।



तू हमसे चाँद इतनी बेरुखी से बात करता है

हम अपनी झील में एक चाँद उतरा छोड़ आए हैं ।


ये दो कमरों का घर और ये सुलगती जिंदगी अपनी,

वहां इतना बड़ा नौकर का कमरा छोड़ आए हैं ।



हमे मरने से पहले सबको ये ताकीत करना है ,

किसी को मत बता देना की क्या-क्या छोड़ आए हैं ।


 दुआ के फूल जहाँ पंडित जी तकसीम करते थे
वो मंदिर छोड़ आये हैं वो शिवाला छोड़ आये हैं



हमीं ग़ालिब से नादीम है हमीं तुलसी से शर्मिंदा

हमींने मीरको छोडा है मीरा छोड आए हैं

अगर लिखने पे आ जायें तो सियाही ख़त्म हो जाये

कि तेरे पास आयें है तो क्या-क्या छोड आये हैं


ग़ज़ल ये ना-मुक़म्मल ही रहेगी उम्र भर “राना”

कि हम सरहद से पीछे इसका मक़्ता छोड आयें है।

Thursday, September 17, 2015

दोस्ती है

दोस्ती है लगाव मिलना बिछड़ना
बिछड़ के फिर मिलना मिलाना
कुछ भी न बोलकर चिड़ाना
कभी कुछ बोलकर चिड़ाना

दोस्ती है साथ खाना खिलाना
खा के उसकी कमियां बताना
किसी को प्यार से खिलाना
तो किसी से खाना बचाना

दोस्ती है साथ गाना गुनगुनाना
गा के फिर मतलब बताना
किसी को गा कर चिड़ाना
फिर उसी को गा कर मनाना

दोस्ती है साथ घूमना घुमाना
रास्ते भर किसी को पकाना
किसी के साथ बेमन जाना
फिर उसी को साथ ले जाना

दोस्ती है साथ यादें बनाना
याद जन्मदिन तक न रखपाना
किसी का अचानक मनाना
तो किसी का कहके मनाना

दोस्ती है बस हक जताना
जो तेरा है उसे अपना बताना
जो खुद का है उसे मेरा बताना
पर काम पड़े तो सब लुटाना

दोस्ती है साथ सपने दिखाना
सपनों में भविष्य बनाना
किसी को ख्वाबों में सजाना
कभी बताना कभी न बताना

माना दोस्ती है रूठ जाना
रूठ कर गलती जताना
मुंह घुमा कर इतराना
पर दोस्ती है अगर तो.... यार मानजाना !!

Saturday, May 23, 2015

उसकी तारीफ़ करू तो यों है कि

उसकी तारीफ़ करू तो यों है कि,

हर विशेषता का विश्लेषण कर,
एक एक अदा का गय्ण गाकर।

कहदूं सारे जहाँ से हां मेरी है वो...

जो....!!

कभी दिवानी कभी सयानी लगती है,
कस्तूरी बन वन महकाया करती है।

चंचल चितवन सुंदर सा यौवन,
पाया है उसने, देवी का सा मन।

बड़ी अनोखी गहरी सी आँखें,
घनी सी पलके पलपल झपकें।

गुलाबी अधरों से गुलाब शर्माये,
मुस्कान देख मन हर्शित होजाये।

बोले तो शब्दों में मिठास आजाये,
कटु स्वरों में भी प्रेम रस छाजाये।

ललाट पर अलोकिक सा तेज़ लिये,
आती है, तो सब कुछ रौशन किये।

हंसी  मधुर कपोलों पर देखकर ही,
जैसे आती हो मुस्कान फ़ूलों पर।

खिलते हैं सब फ़ूल जिसे देखकर,
ऐसा जादू करती है उन्हें छूकर।

उसके बालों का ही टौर देखकर,
आती हो घनी घटायें घनघोर कर।

चलती है इठलाकर कुछ बलखाकर,
नदियाँ भी चिड़ जाती हैं कतराकर।

चित्तचोर है, समंदर की हिलोर है,
मुझे उससे बांधे एक कच्ची डोर है।

डोर की रक्षा में सारी उर्जा लगाई है,
बस एक वो ही मेरे दिल पर छाई है।

Saturday, November 8, 2014

गंगा स्नान मेले का एक प्रत्यक्ष वर्णन|

आज कार्तिक माह की त्रिपुरारी पूर्णिमा वर्ष ५११६ का दिन है और इस दिन माँ गंगा के पवित्र और अदूषित जल प्रवाह में स्नान करने का आध्यात्मिक महत्व है। गढ़ मुक्तेश्वर तथा गंगा नदी के किनारे बसे कुछ गाँवो में इन दिनो धार्मिक श्रद्धा और उत्सव से भरा माहौल हर साल देखने को मिल जाता है। जिसका कारण है, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष में चलने वाला मेला जो आज के दिन पूरा होता है।
इन दिनो मैं उत्तर प्रदेश के हापुर जिले में रह रहा हूँ, जो यहाँ से बहुत अधिक दूरी पर नहीं है। यही बात थी या गंगा जी का बुलावा था कि बस मैने भी गंगा जी के दर्षन और स्नान का मन बना लिया। एक विचार और था मन में की आज तक कभी कोई मेला नहीं देखा है क्यों न मन में बने मेले के निर्जीव चित्रण को सजीव कर लिया जाये।
मेले का व्रितांत शुरु करते हूये ये बताना जरूरी है कि मेरे मन में मेले की छवी कुछ ऐसी थी के कुछ छोटे बड़े झूलों के साथ खाने पीने कि वस्तुऎं होंगी, इन्ही विचारों को मन में संजोये जब यात्रा शुरू की तो रेलगाड़ी से जाना ही उचित समझा।
गढ़ की ओर जाने वाली गाड़ी में चढ़ गये, अब गंगा जी के सबसे पास कौन सा स्टेश्न है, जहां उतरा जाये इसकी जानकारी नहीं थी तो साथ बैठे लोगों से पता चला कि एक जगह है ब्रजघाट जहां घाट बने हुये हैं और दूसरी जगह है गढ़ गांव से आगे जहां गंगा नदी बहती हैं। उसके किनारे पर मेला लगता है, मेरा लक्ष्य मेला था तो ब्रजघाट न चुन कर गढ़ उतरने का फ़ैसला किया। दो घण्टे के उमंग और कल्पना से व्याप्त रेल यात्रा के बाद एक ठैराव आया गढ़ स्टेशन आया और उतरते ही भीड़ के साथ साथ कब स्टेशन से बाहर निकला पता नहीं चला, सम्भलते ही सामने देखा तो एक चौड़ी सड़क थी पर गाड़ियों से भरी हुई थी। रास्ता ढूंढ़ते हुये कुछ दूर चला तो आगे सड़क पर एक मंदिर और द्वार था पुराने लोग ये बताते हैं कि कभी इस द्वार से कुछ दूरी पर हे जो ८५ सीडियां हैं उनके निकट से बहती थी माँ गंगा पर आज स्थिति कुछ ये है की गंगा जी यहां से तकरीबन ६ मील दूर हैं। अब आगे बढ़्ते हैं, सरकार की कोई योजना थी या स्थानिय लोगों की व्यवस्था हमें आगे की राह आसान लगने लगी क्योंकि ६ मील पैदल सुनकर तो थकान होने लगी थी पर मेले तक पहुंचने के लिये ट्रक्टर ट्रौली की सवारी थी उस पर चढ़ गये। अब आगे की राह ऐसी थी कि एक सकरी सी सड़क जिसके दोनों तरफ़ कुछ दूरी पर खेत थे। कुछ दूर चलते ही देखा कि मेले जाने वालों से ज्यादा भीड़ आने वालों की थी क्योंकि ये मेले का आखिरी दिन था। आने वाले लोगों में साइकल, मोटर साइकल, घुड़सवार, घोड़ा गाड़ी, बैल गाड़ी, कार, जीप अथवा ट्रैक्टर ट्रौली सभी शामिल थे और आने वालों की अधिकांश्ता के कारण जाने वालों को राह नहीं मिल पा रही थी। जैसे तैसे ४ मील की यात्रा ४० मिन में पूरी हो पायी जो शायद पैदल भी इतने ही समय में तय हो जाती। अब आगे मेले का एक धुंधला नज़ारा मिल रहा था। जिसमें बड़े बड़े झूले नज़र आ रहे थे जो रोमांच को बढ़ाने के लिये काफ़ी थे। पैदल आधा मील चलते ही मेले में प्रवेश हुआ और दृश्य ये था कि गंगा जी तक जाने के लिये कई गलियारे बने थे जिनके दोनो तरफ़ वहां रूकने वालों के तम्बू थे और आगे चलकर दुकाने थी तो तट जाने के लिये एक राह पकड़ी।
अब जो देखा वो कोई मंजिल पाने वाले भावों को पैदा करने वाला दृश्य था। जिसने रोमांच से रोंगटे खड़े कर दिये और सकारात्मक ऊर्जा से तन और मन में कंपन करदी गंगा जी के तट से विशाल गंगा जी को नमन करते हुये आंखे उठी तो बहुत दूर धुंधला सा एक दृश्य गंगा जी के दूसरे छोर पर देखा जहां बड़े बड़े पर थोड़े धुंधले गोल-गोल झूले जैसे इस तरफ़ थे वैसे हे दिख रहे थे। नदी के किनारे किनारे बहुत दूर तक तम्बू भी नज़र आ रहे थे। लोगों से पूछ्ने पर पता चला कि उस तरफ़ भी ऐसा ही मेला लगता है। जिसे तीगरी का मेला कहा जाता है, जो कि मुझे दिखाई दे रहा था की इस तरफ़ से भी कहीं अधिक विशाल और गूड़ है।
गंगा के किनारे किनारे गीली रेत पर निशान बनाते पांवो से लोगों की भीड़ से बचते हुये दूर चलने लगा और एक अनुकूल जगह देखकर गंगा जी में प्रवेश करने से पहले आशिर्वाद लेता हुआ पानी में उतर गया, समय दिन के तीसरे पहर का था जिस कारण ज्यादा ठिठुरन महसूस नहीं हूई। जब आधा शरीर पानी में चला गया तो सांस रोकते एक गोता लगाया और हर हर गंगे का जाप करते हुये जब उपर आया तो गंगा जी के पवित्र जल में सारे तन मन के पाप धुलने की अनुभूती का आनंद लेते हुये तकरीबन घण्टे भर नहाने के बाद सुर्य देव को नमस्कार करके गंगा जी की लहरों के प्रवाह से बाहर आया और सोंचा की अब चला जाये। कपड़े पहनते हुए याद आया कि एक और जरूरी काम है जो की सुर्य के ढ़लने के बाद ही करना है और पूरे कपड़े पहन कर जब नज़र घूमी तो एक बार फ़िर गंगा जी का उस पार तीगरी वाला मेला दिखा। ये विचार आया की उस तरफ़ कैसे जाया जाये।
इसी बीच एक बाबा जी सफ़ेद दाड़ी वाले विशाल शरीर के भगवा वस्त्र तथा माला धारण करे हुये नंगे पाँव मेरी तरफ़ आते दिखे और आशिर्वाद देते हुये भिक्षा की उपेक्षा की जैसा कि सभी करते हैं। वे मुझे आशिर्वाद के साथ साथ एकमुखी रूद्राक्ष भी देना चाहते थे उनके हांथ में एक ड्ब्बा दिखा जिसमें और भी अध्यात्मिक वस्तुऎं थी। मुझे रूद्राक्ष दिखाते हुये बोले बेटा ये लेले एक मुखी रूद्राक्ष बड़ा ही दुर्लभ है ये टहनी लगा हुआ है वास्तव में उस रूद्राक्ष पर टहनी थी जो के पेड़ से टूट्ते समय उस पर लगी रह गयी होगी। मैंने नज़र उनके डब्बे पर गड़ाई हुई थी, जिसमें से एक पंचमुखी रूद्राक्ष उठाकर कहा बाबा जी मुझे ये भी चाहिये। बोले ले ले बेटा और मैंने उन्हें कुछ द्क्षिणा दी तो बोले इतने में तो बेटा जी ये दुर्लभ एकमुखी नहीं मिलेगा। तुम चाहो तो पंचमुखी रख लो मैने भी संतुष्टी के भाव को प्रकट करते हुये, वही रूद्राक्ष रख लिया और उनसे पूछा बाबा जी उस पार कैसे जायें। उन्होंने अपने हांथ को उठाते हुये अपनी मोटी मोटी उंगलियों से इशारा करते हुये नाव के टिकट लेने का स्थान दिखाया और मैंने हांथ जोड़कर उनसे विदा ली। इस तरफ़ पता चला कि उस तरफ़ कैसे जाया जाये। आगे कि ओर बढ़्ने लगा अघले ही कुछ क्षड़ों में मैं एक नाव में बैठा था और मैंने देखा कि उसी नाव में कुछ दूर वही बाबा जी भी बैठे हैं खैर मैं इस नांव की यात्रा का आनंद ले रहा था। मैंने डूबते सूर्य की किरणों और किसी नदी की लहरों को एक साथ नहीं देखा था। डूबते सूर्य की उज्ज्वल किरणें गंगा के जल में स्नान करके चमचमाती हुई सुनहरी-सुनहरी बड़ी चित्ताकर्षक लग रही थीं। ये देखकर मैंने मेरे मन में एक और छवी को सजीव करते हुये दो चार तस्वीरें ली।
देखते देखते ही गंगा जी का दूसरा छोर आ गया और उतरते समय बाबा जी ने फ़िर एक बार चलते चलते घेरा और एक मुखी रूद्राक्ष दिखाते हुये बोले "ले ले बेटा किस्मत बदल जायेगी" मैंने सोचा कि चलो ले ही लेते हैं कहते हैं आज के दिन किया गया दान पूण्य कई गुना होकर मिलता है, बाकी किस्मत बदलने का ऐसा कोई लोभ था नहीं। ये सोंचते हुये मैंने बाबा जी को कुछ और दक्षिणा देते हुये वो ले लिया और आगे चलते चलते बातों में पता चला कि वो रुद्रपुर, उत्तराखण्ड के एक मंदिर के पुजारी हैं और यहां गंगा नहाने आये हैं। जाते जाते उन्होंने एक बार फ़िर अपने दिये एकमुखी रूद्राक्ष को याद किया और कहा बेटा ये तेरी ही किस्मत में था बोले बेटे इसे मंदिर में सिंदूर की डिब्बी में रखना सुनकर गर्दन हिलाकर रज़ामंदी दिखाते हुये मैंने एक बार फ़िर हांथ जोड़ कर उनसे विदा ली और आगे मेले में घूमने लगा तो पाया कि इस ओर (तीगरी) और उस ओर(गढ़) के मेले में बहुत ज्यादा फ़र्क है और वो ये है कि इस तरफ़ आने वाले लोग तीगरी, गज्रौला, अम्रोहा, मोरादाबाद, रामपुर, बरेली और उत्तराखण्ड के जिलों के लोग थे जो कि गांव और ज़मीन से जुड़े लोग थे। जबकी उस तरफ़ हापुड़, गाजियाबाद, दिल्ली गुड़्गांव फ़रीदाबाद के लोग थे, जो कि शहरी लोग थे और इस बात को मैं इतने निश्चित तौर पर इसलिये कह सकता हूं क्योंकि आते समय उस सकरी सी सड़क पर मेले से वापस आती हुई कारों पर इन्हीं जिलो के पंजीक्रित नंम्बर(HR 26,HR 51..) मौजूद थे। तो शहर और गांव के इस मेले में गांव का मेला मुझे ज्यादा लुभावना और गहरी अध्यात्मिकता प्रकट करता लगा। ये सोंचकर मन में एक संतुष्टी हुई के चलो शाम का जो जरूरी और पूण्य का काम है, उसके लिये ये जगह ज्याद अनुकूल है।
इतने में शाम भी डल चुकी थी अंधेरा हो गया था और एक तरफ़ से पूनम(पूर्णिमा) का पूरा चांद सूर्य से रोशनी लेता हुआ सुर्ख लाल रंग का चढ़ने लगा। यही सब देख
ते हुये मैं वापस गंगा जी के तट की ओर बढने लगा। एक पंडित जी के पास जाकर अपनी इच्छा ज़ाहिर की कि पंडित जी मुझे दीप जला कर बहाने हैं, इस बात का ये महत्व है कि जिस साल ये मेला लगता है उसी वर्ष अगर घर में किसी का देहांत हुया है, तो उनके नाम का दिया गंगा जी में बहाया जाता है। तो पण्डित जी को अपनी माता जी के बारे में जानकारी देते हुये मंत्रोच्चारण के साथ साथ दो दीप प्रज्वलित किये और गंगा माँ के पवित्र पानी पे अपनी मां और पित्रों को याद करते हुये बहा दिये। गंगा जी का आशिर्वाद लेकर पानी से बाहर आते हुये अखिरी प्रणाम गंगा जी को किया और वापस अपने निवास स्थान कि ओर प्रस्थान किया।
इस यात्रा से एक ज्ञान ये मिला कि किसी भी यात्रा में एक सुनियोजित योजना का होना बहुत आवश्यक है। यदी वह यात्रा आध्यात्म से कोई रिश्ता रखती है तो ये बहुत जरूरी हो जाता है कि आप वहां के सभी रीती रिवाजों, धार्मिक तथ्यों तथा भौतिक महत्वों की पहले से ही जानकारी लेकर जायें जिससे आप की यात्रा और सफ़ल हो सकती है साथ ही आप सभी धार्मिक कृत्यों को समय और रीति के अनुसार कर भी सकेंगे।

Sunday, July 7, 2013

आज उर मेरा अस्थिर है, भारत का एक हिस्सा अस्थिर है

मर मर कर जीते हैं, मर मर कर जीना होगा
अगर नहीं जागे तो, अत्याचारों को सहना होगा

आज उर मेरा अस्थिर है, भारत का एक हिस्सा अस्थिर है
एक नहीं, दो नहीं, नौ-नौ गोलों से विदीर्ण हूई मेरी धरती है

हम अंधे बहरे बने रहे, हिन्दू हम आपस में कटे मरे
भारत माता लज्जित रहे, और विधर्मी हमपर राज करे

धधक धधक कर जलती माता, आज अग्नि से झुलसती माता
और लज्जा का एक भावमात्र तक न किसी मस्तक पर आता

हम भाई-भाई कहलाने का एक तरफ़ा विचार करे
वो छाती पर वार करे और हम बैठे बस दुराचार का दीद करे

कट्‍टर कहाते हम घबराते, माताओं का दूध लजाते
तिलक लगाते हम शरमाते, दूर बैठ कर बस बतियाते

प्राणों की अंतिम आहुती देकर, भारत मां को पूर्ण स्वतंत्र करें
वर्षों से जलती छाती को अब बैरी का लहू चढ़ा कर शांत करें

आज उर मेरा अस्थिर है, भारत का एक हिस्सा अस्थिर है
एक नहीं, दो नहीं, नौ-नौ गोलों से विदीर्ण हूई मेरी धरती है

------ पटेल अरूण स्वदेशानुरागी

Thursday, October 18, 2012

मैं रोज नही मरना चाहता, एक बार भिड़ जाने दो



मैं रोज नही मरना चाहता,
बस एक बार भिड़ जाने दो
यूं रोज रोज डरना छोड़ो,
बस एक बार भिड़ जाने दो


एक सो बीस हम है और
एक सॊ पचास-साठ वो है
हे चीन, इतिहास शाक्षी है
जीत कद से नहीं ऊंचे हॊसले से है
सीमा विस्तार ही प्रव्रिती है तुम्हारी तो
हम भी इस भारत भू का दम भरते हैं


हे पाक काश्मीर-काश्मीर
क्यों चिल्लाता है, भूल गया क्या,
तू खुद तो भाग हमारा है
ये जानते हैं हम, ये जानते हैं हम.....
तू संयुक्त राष्ट्र के दम,
पर ही तो छ्लांग लगाता है।

इटली की मैड़म मैं तेरा क्या दोष धरूं
जब अपना ही प्रतिनिधि खोटा है
जिसने मैड़म से पैसा लेके
स्विस बैंक में खाता खोला है।
यों धोके से तुमने लूटा है
वोट, सांसद, विधायक तो क्या
खनिज़, बीज और ज़मीन को भी बेचा है।

अगर विचार लूट का है
तो लाल किले से ऐलान करो
अगर हममें भारत का खून है
तो हम जीत लेंगे.....
तुममे इटली के खून का गर्व हो,
तो तुम जीत.. लेना....!!

-------------------------------------------------------------------------   पटेल अरूण



Thursday, October 11, 2012

कभी कभी


कभी मासूम लगती हो,
कभी ज़ालिम सी लगती हो....

गंगा की धार लगती हो,
कभी सरोवर सी शांत लगती हो....

कभी एक खाब लगती हो,
कभी स्वयं प्रमाण लगती हो....

प्रत्यक्ष होके अप्रत्यक्ष लगती हो,
अप्रत्यक्ष होके प्रत्यक्ष सी लगती हो....

किसी असमंजस का हल लगती हो,
कभी खुद असमंजस का कारण लगती हो.....

                                                      -------------- पटेल अरुण

Tuesday, June 19, 2012

कृषक - kisaan per kavita


कड़ी कर्कट धूप और वो सूक्ष्म रास्ते
संकल्पशील मानस का संकल्प निहारते
ना जाने क्या दायित्व निभाने को आतुर
जैसे देश पालन-पोषण के बोने हो अंकुर

आज ठोस माटी की दृढ़ता का सामना
हल की नोक पर है, जान को झोकना
फ़िर बीज का थैला लै बुवाई करनी
फ़सल पर किस्मत की अगुवाई करनी

घोर अंधकार में चल रही बयार में
सूर्य से पूर्व आज उठ चले मैदान में
रास्ते के विघन कोहरे से है सामना
सर्द ऋतु में स्वेदजल से फ़सल सीचना

नि:स्वार्थ उपज को सुत समान पालते
हम गर्वित हो श्रमिको के श्रम को निहारते
बाद ताप के शाप, वर्षा ऋतु मी को तरसाती
मेघ-दूत के अधीन हो मेघ को निहारते

खेत अब वात से बात कर लहलहाते
तब वे निर्भय निडर हो खेत मे जागते
उग्र प्राणीयों से रखवाली मे रात गुजारते
मैं कवी हूं.. उन भूमीपुत्रो को नमन करता हूं

----------- पटेल अरूण स्वदेशानुरागी

गंगा हमसे करे पुकार....


गंगा हमसे करे पुकार....
मेरे देश वासीओं,
तुम पर ही उम्मीद टिकी है
ये उद्योग पती तो होस खो चुके
मुझे मलिन और मैली करते है

साधु-संत अनशन कर मरते है
कोइ ना उनकी सुनने वाला
तुम पर ही आस बंधी है
सरकार ने तो है, मुझे नकारा

मुझसी धरोहर क्यों खोते हो
उठो चलो आह्वान करो और
उन लोगो की संगत लो
जो मुझे बचाने को तत्पर है

पटेल अरूण स्वदेशानुरागी

अभी जंतर मंतर में किया है अब आगे रामलीला में होगा..... अधिक से अधिक संख्या मे पहुंचो

Sunday, June 10, 2012

मन करता है फ़ूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर,


मन करता है फ़ूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर,
भारत के बेटे शरणार्थी हो गए अपनी धरती पर
भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर की छाती पर
वे घाटी से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर
जिनकी नाक टिकी रहती है पाकिस्तानी जूतों पर
काश्मीर को बंट्वारे का धंधा बना रहे हैं वो
जुगनू को बैसाखी देकर चन्दा बना रहे हैं वो
फ़िर भी खून-सने हाथों को न्योता है दरबारों का
जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा हो अंधियारों का
काश्मीर है जहां देश के दिल की धड़कन रोती है
संविधान की जहां तीन सॊ सत्तर अड़चन होती है
काश्मीर है जहां दरिंदो की मनमानी चलती है
घर-घर में ए. के. छ्प्पन की राम कहानी चलती है
काश्मीर है जहां हमारा राष्ट्रगान शम्रिंदा है
भारत मां को गाली देकर भी खलनायक जिन्दा है
काश्मीर है जहां देश का शीश झुकाया जाता है

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा


सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा
हम बुलबुले है इसकी ये गुलसिता हमारा ॥धृ॥

घुर्बत मे हो अगर हम रहता है दिल वतन मे
समझो वही हमे भी दिल है जहाँ हमारा ॥१॥

परबत वो सब से ऊंचा हमसाय आसमाँ का
वो संतरी हमारा वो पासबा हमारा ।२॥

गोदी मे खेलती है इसकी हजारो नदिया
गुलशन है जिनके दम से रश्क-ए-जना हमारा ।३॥

ए अब रौद गंगा वो दिन है याद तुझको
उतर तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा ॥४॥

मझहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना
हिन्दवी है हम वतन है हिन्दोस्तान हमारा ॥५॥

युनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिल गये जहाँ से
अब तक मगर है बांकी नामो-निशान हमारा ॥६॥

कुछ बात है की हस्ती मिटती नही हमारी
सदियो रहा है दुश्मन दौर-ए-जमान हमारा ॥७॥

इक़्बाल कोइ मेहरम अपना नही जहाँ मे
मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहा हमारा ॥८॥

जय हिन्द जय भारत...!!

Sunday, May 6, 2012

चेहरा


जब रात तन्हाई छाती है
चेहरा मेरी प्रीयतमा का
यों दिखलाती है, ज्यों चांद निकलता बादल से

चेहरा उसका आते ही
तन्हाई तो धूमिल सी हो
शून्य क्षुद्र हो जाती है

यादों का चक्कर चलता है
मन घूम झूम हर्शित हो
बेधड़क धड़कने लगता है

तब निंद्रा बहुत सताती है
पास आते आते एक ओर हो
छिपकर कहीं निकल जाती है

थोड़ा स्वार्थपर मन होता है
वाद विवाद से एक तरफ़ हो
शयन-शैया पर सोना चाहता है

रात्रि का दूसरा पहर गुजरता है
तब मैं और रैन परस्पर बढ़ते है
साथ रात के पहरों का पहरा देते हैं

तब निंद्रा बहुत सताती है
पास आते आते एक ओर हो
छिपकर कहीं निकल जाती है

ऐसी आकुलता मे रात गुज़रती है
जैसे तर्क-वितर्क ही होते हो
ना हम सोते हो ना वो सोने देते हो

इस कदर कहर झेलना पढ़ता है
तब कही शोशण का पोषण करते
आंख हमारी लग जाती है

प्रतिरात्रि हमसे रात्रि यही खेल खेलती है
ना हम सोते है ना वो सोने देती है

---------पटेल अरूण स्वदेशानुरागी

Friday, March 30, 2012

टाट्रा ट्रक घोटाला

टाट्रा ट्रक घोटाला-
भारतीय थल सेना मे गहमागहमी है,
सभी बोल रहे है, मीडिया बोल रही है,
सेना प्रमुख और रक्षा मंत्री बोल रहे है,
सान्सद बोल रहे है, निलंबित हो रहे है,
किन्तु हमारे माननीय प्रधानमन्त्रि अब तक मोन रहे है.....
इस बात पर हैरान न होना मित्रो......
शायद उनको अब तक मेम साहब से आदेश ही नही मिले है।

क्यो


मुझे बता दो दोस्तो ऐसा क्यो हो रहा है... क्यो
जिस देश मे जन्म लेना ही भाग्यशाली माना जाता था,
आज उसी देश मे सारे अप्रवासी भारतीय बनना चाहते है क्यो....
ये वो देश है जिसमे विदेशी आकर शिक्षा पाने का स्वप्न देखते थे,
आज उसी देश के युवा बाहर जाके शिक्षा लेने पर गर्व महसूस करते है क्यो...
जिस देश मे जन्म लिया उसी देश को प्रतिभा पलायन जैसी दुविधा देते है क्यो....
दोस्तो क्यो..... !!
कुछ सोचो दोस्तो आखिर कमी है कहां.......

Sunday, March 11, 2012

एक दिन रुसवाई मे यारी को कोस रहे थे हम
हम और हमारा जाम, रात काट रहे थे हम
अचानक खालि हुई... बोतल ने समझाया कि
यारी नही ये तो वो इश्क है जिसके कारण रो रहे थे हम
बढ्ती मसरूफ़ियतो ने ऐसा दूर किया हमको
के अब सभी पहले जैसे हस खेल सकते नही
दिल से शूक्रिया अदा करते है facebook का
के अब जुदा होकर भी हम यारो से जुदा होते नही............
यारो साथ बैट कर मैखाने मे एक दिन पी रहे थे हम,
मदहोशी मे हमारी कुछ ऐसा हुआ,
एक पुराने गम ने पूछा क्या आप अब भि वही रहते है,
हमने कहा चले मत आना तुम्हे भुलाने के लिए अब हम यही रहते है/

Wednesday, February 8, 2012

ऐसे -जैसे

रात को तन्हाई भरे पलो मे मन जब कुच सोचता है
तो उसका चेहरा आखो़ के सामने ऐसे उभरता है
जैसे बाद्लो मे से चा़़द निकलता है,
मेरी रातो कि तन्हाई को इस तरह उडा जाता है
जैसे पानी अपनी रफ़्तार से क़कड बहा ले जाता है
और
बिना कुछ कहे सुने वो चेहरा ऐसे ओझल हो जाता है
जैसे पतझड मे पेडॊ से पत्ते ओर नूर ओझल हो जाता है

इश्क-ए-हाल

कोइ मुझसे पूछे जो गर, इश्क मे क्या हाल बना रखा है
तो कह दू उसे....
याद-ए-दिल, याद-ए-जिगर, याद-ए-तमन्ना लेकर
अपनी वीरान बहारो़ को सजा रखा है//

उनसे मिलने का दिन जो पास है

उनसे मिलने का दिन जो पास है,

ना जाने क्यो़ दिल आज थोडा उदास है,
कुछ पाने का या सब खोने का अहसास है/

उनसे मिलने का दिन जो पास है

दिल थोडा खुश और कहि़ ज्यादा उदास है,
यहि अजीब सि दुविधा अब मेरे पास है/

उनसे मिलने का दिन जो पास है

दोस्तो़ से नहि छिपता न जाने ये कैसा राज है,
दोस्तो़ से घिरे है मगर दिल मे़ उसिके साज है/

उनसे मिलने का दिन जो पास है
शायद प्यार बस यहि एक अहसास है/

Friday, January 13, 2012

अब तू बनि है

अब तू बनि है किसी और की जिद्गी का उन्वा,
अब तेरी राते़ उसकी बाहो़ मे़ बसी रहती है,
अब ना उस उल्फ़त की हकीकत बाकी,
फ़िर भी नादान दिल मे उम्मिदे़ बनि रहती है.

द्र्ख्वास्त

एक द्र्ख्वास्त ये दिल तुमसे करना चाहता है,
आति रहा करो मिलने जब तलक मुम्किन है,
क्यो़ ना तब तलक इश्क को अपने वजह मिलति रहे जीने को,

मलाल

इससे बड. कर मलाल शायरी मे़ क्या होगा,
लिखता हू़ जिसके लिये उसको गुमा़न ही नहि,
समझे मुझे सारा जहा़न तो भी क्या होगा,
गर ज़ज़्बा मेरा जिसके लिये उस पर अया़ ही नहि.

Thursday, January 5, 2012

प्रतीक्षा - हरिवंशराय बच्चन

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?

मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आने वाले,
पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले,
साँसें घूमघूम फिरफिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं,
मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता?

उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले,
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपने होश सम्हाले,
तारों की महफिल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से,
मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता?

बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती,
रगरग में चेतनता घुलकर, आँसू के कणसी झर जाती,
नमक डलीसा गल अपनापन, सागर में घुलमिलसा जाता,
अपनी बाँहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता?

Friday, January 14, 2011

कौन किस को यहाँ भला समझा हम ने क्या समझा, तुम ने क्या समझा बेवफा हम ने तुम को समझा सनम तुम ने हम को ही बेवफा समझा  झूठे इल्जाम, मेरी जान, लगाया ना करो दिल हैं नाजूक, इसे तुम ऐसे दुखाया ना करो झूठे इल्जाम मेरी जान लगाया ना करो  मेरी आँखो में जो अच्छे नहीं लगते आँसू तो जलाया ना करो, मुझ को सताया ना करो दिल हैं नाजूक, इसे तुम ऐसे दुखाया ना करो झूठे इल्जाम मेरी जान लगाया ना करो  तुम किसी और की किस्मत में हो, तुम मेरे नहीं ये अगर सच भी हैं, तो मुझ को बताया ना करो दिल हैं नाजूक, इसे तुम ऐसे दुखाया ना करो झूठे इल्जाम मेरी जान लगाया ना करो  या तो तावीर बताओ मेरे सब ख्वाबों की या कोई ख्वाब इन आँखों को दिखाया ना करो दिल हैं नाजूक, इसे तुम ऐसे दुखाया ना करो झूठे इल्जाम मेरी जान लगाया ना करो  अभी आये हो, अभी बैठे, अभी जाते हो सिर्फ एक रस्म निभाने को तो आया ना करो दिल हैं नाजूक, इसे तुम ऐसे दुखाया ना करो झूठे इल्जाम मेरी जान लगाया ना करो
Ab Agar Aao To Jaane ke Liye Mat Aana
Sirf Ahsaan Jataane ke Liye Mat Mana

Maine Palkon Pe Tamannaen Saja Rakhi Hain
Dil Par Umeed ki 100 Rasmen Jala Rakhi Hain
Ye Hanseen Shamen Bujhaane ke Liye Mat Aana

Pyar ki Aag Main Zanjeer Pighal Sakti Hai
Chahne Walon ki Takdeer Badal Sakti Hai
Hoon Bebas Ye Batane ke Liye Mat Aana

Mujhse Milne ki Agar Tumko Nahi Chahat koi
Tum Sirf Rasmen Nibhane ke Liye Mat Aana
Aahat Aahat intezaar kar ke dekhna
kabhi kissi say pyar kar ke dekhna

Toot jatey hain khoon ke rishtay bhi
Ghaltiyaan do-chaar kar ke dekhna

Agar zindagi ka falsaffa samajhna ho
barish me kachchi dewaar kharhi kr k dekhna

Kaee janam beet jayein gay janaa
kabhi meri mohabbatein shumaar kr k dekhna

hamaare shauq kii ye intehaa thii

qadam rakhaa ke manzil raastaa thii

(shauq : desire; intehaa : apex; qadam : step; manzil : destination; raastaa : way)

bichaR ke Daar se ban-ban phiraa vo
hiran ko apnii kastuurii sazaa thii

(Daar : abode; ban : forest; hiran : deer; kastuurii : musk-deer)

kabhii jo Khvaab thaa vo paa liyaa hai
magar jo kho gayii vo chiiz kyaa thii

maiN bachpan meN khilaune toRtaa thaa
mere anjaam kii vo ibtidaa thii

(anjaam : end; ibtidaa : beginning)

muhabbat mar gayii mujhko bhii Gham hai
mere acche dinoN kii aashnaa thii

(aashnaa : friend)

jise maiN chhuu luuN vo ho jaaye sonaa
tujhe dekhaa to jaanaa bad-du’aa thii

mariiz-e-Khvaab ko to ab shafaa hai
magar duniyaa baRii kaRvii davaa thii

ab bhalaa chhoR ke ghar kyaa karte
shaam ke vaqt safar kyaa karte
terii masruufiyateN jaante the
apne aane kii Khabar kyaa karte

(masruufiyateN : engagements)

jab sitaare hii nahiiN mil paaye
le ke ham shams-o-qamar kyaa karte

(shams-o-qamar : Sun and the Moon)

vo musaafir hii khulii dhuup kaa thaa
saaye phailaa ke shajar kyaa karte

(shajar : tree)

Khaak hii avval-o-aaKhir thahrii
kar (?) ke zarre ko gauhar kyaa karte

(Khaak : dust; avval-o-aaKhir : in the beginning and the end; zarre : particles; gauhar : jewels)

raaye pehle se hii banaa lii tuune
dil meN ab ham tere ghar kyaa karte
ishq ne saare saliiqe bakhshe
husn se kasb-e-hunar kyaa karte

(saliiqe : etiquettes; kasb-e-hunar : ?)