Sunday, June 10, 2012

मन करता है फ़ूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर,


मन करता है फ़ूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर,
भारत के बेटे शरणार्थी हो गए अपनी धरती पर
भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर की छाती पर
वे घाटी से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर
जिनकी नाक टिकी रहती है पाकिस्तानी जूतों पर
काश्मीर को बंट्वारे का धंधा बना रहे हैं वो
जुगनू को बैसाखी देकर चन्दा बना रहे हैं वो
फ़िर भी खून-सने हाथों को न्योता है दरबारों का
जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा हो अंधियारों का
काश्मीर है जहां देश के दिल की धड़कन रोती है
संविधान की जहां तीन सॊ सत्तर अड़चन होती है
काश्मीर है जहां दरिंदो की मनमानी चलती है
घर-घर में ए. के. छ्प्पन की राम कहानी चलती है
काश्मीर है जहां हमारा राष्ट्रगान शम्रिंदा है
भारत मां को गाली देकर भी खलनायक जिन्दा है
काश्मीर है जहां देश का शीश झुकाया जाता है

No comments:

Post a Comment