Friday, January 13, 2012

अब तू बनि है

अब तू बनि है किसी और की जिद्गी का उन्वा,
अब तेरी राते़ उसकी बाहो़ मे़ बसी रहती है,
अब ना उस उल्फ़त की हकीकत बाकी,
फ़िर भी नादान दिल मे उम्मिदे़ बनि रहती है.

द्र्ख्वास्त

एक द्र्ख्वास्त ये दिल तुमसे करना चाहता है,
आति रहा करो मिलने जब तलक मुम्किन है,
क्यो़ ना तब तलक इश्क को अपने वजह मिलति रहे जीने को,

मलाल

इससे बड. कर मलाल शायरी मे़ क्या होगा,
लिखता हू़ जिसके लिये उसको गुमा़न ही नहि,
समझे मुझे सारा जहा़न तो भी क्या होगा,
गर ज़ज़्बा मेरा जिसके लिये उस पर अया़ ही नहि.

Thursday, January 5, 2012

प्रतीक्षा - हरिवंशराय बच्चन

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?

मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आने वाले,
पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले,
साँसें घूमघूम फिरफिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं,
मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता?

उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले,
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपने होश सम्हाले,
तारों की महफिल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से,
मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता?

बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती,
रगरग में चेतनता घुलकर, आँसू के कणसी झर जाती,
नमक डलीसा गल अपनापन, सागर में घुलमिलसा जाता,
अपनी बाँहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता?