कड़ी कर्कट धूप और वो सूक्ष्म रास्ते
संकल्पशील मानस का संकल्प निहारते
ना जाने क्या दायित्व निभाने को आतुर
जैसे देश पालन-पोषण के बोने हो अंकुर
आज ठोस माटी की दृढ़ता का सामना
हल की नोक पर है, जान को झोकना
फ़िर बीज का थैला लै बुवाई करनी
फ़सल पर किस्मत की अगुवाई करनी
घोर अंधकार में चल रही बयार में
सूर्य से पूर्व आज उठ चले मैदान में
रास्ते के विघन कोहरे से है सामना
सर्द ऋतु में स्वेदजल से फ़सल सीचना
नि:स्वार्थ उपज को सुत समान पालते
हम गर्वित हो श्रमिको के श्रम को निहारते
बाद ताप के शाप, वर्षा ऋतु मी को तरसाती
मेघ-दूत के अधीन हो मेघ को निहारते
खेत अब वात से बात कर लहलहाते
तब वे निर्भय निडर हो खेत मे जागते
उग्र प्राणीयों से रखवाली मे रात गुजारते
मैं कवी हूं.. उन भूमीपुत्रो को नमन करता हूं
----------- पटेल अरूण स्वदेशानुरागी
