Tuesday, June 19, 2012

कृषक - kisaan per kavita


कड़ी कर्कट धूप और वो सूक्ष्म रास्ते
संकल्पशील मानस का संकल्प निहारते
ना जाने क्या दायित्व निभाने को आतुर
जैसे देश पालन-पोषण के बोने हो अंकुर

आज ठोस माटी की दृढ़ता का सामना
हल की नोक पर है, जान को झोकना
फ़िर बीज का थैला लै बुवाई करनी
फ़सल पर किस्मत की अगुवाई करनी

घोर अंधकार में चल रही बयार में
सूर्य से पूर्व आज उठ चले मैदान में
रास्ते के विघन कोहरे से है सामना
सर्द ऋतु में स्वेदजल से फ़सल सीचना

नि:स्वार्थ उपज को सुत समान पालते
हम गर्वित हो श्रमिको के श्रम को निहारते
बाद ताप के शाप, वर्षा ऋतु मी को तरसाती
मेघ-दूत के अधीन हो मेघ को निहारते

खेत अब वात से बात कर लहलहाते
तब वे निर्भय निडर हो खेत मे जागते
उग्र प्राणीयों से रखवाली मे रात गुजारते
मैं कवी हूं.. उन भूमीपुत्रो को नमन करता हूं

----------- पटेल अरूण स्वदेशानुरागी

गंगा हमसे करे पुकार....


गंगा हमसे करे पुकार....
मेरे देश वासीओं,
तुम पर ही उम्मीद टिकी है
ये उद्योग पती तो होस खो चुके
मुझे मलिन और मैली करते है

साधु-संत अनशन कर मरते है
कोइ ना उनकी सुनने वाला
तुम पर ही आस बंधी है
सरकार ने तो है, मुझे नकारा

मुझसी धरोहर क्यों खोते हो
उठो चलो आह्वान करो और
उन लोगो की संगत लो
जो मुझे बचाने को तत्पर है

पटेल अरूण स्वदेशानुरागी

अभी जंतर मंतर में किया है अब आगे रामलीला में होगा..... अधिक से अधिक संख्या मे पहुंचो

Sunday, June 10, 2012

मन करता है फ़ूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर,


मन करता है फ़ूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर,
भारत के बेटे शरणार्थी हो गए अपनी धरती पर
भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर की छाती पर
वे घाटी से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर
जिनकी नाक टिकी रहती है पाकिस्तानी जूतों पर
काश्मीर को बंट्वारे का धंधा बना रहे हैं वो
जुगनू को बैसाखी देकर चन्दा बना रहे हैं वो
फ़िर भी खून-सने हाथों को न्योता है दरबारों का
जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा हो अंधियारों का
काश्मीर है जहां देश के दिल की धड़कन रोती है
संविधान की जहां तीन सॊ सत्तर अड़चन होती है
काश्मीर है जहां दरिंदो की मनमानी चलती है
घर-घर में ए. के. छ्प्पन की राम कहानी चलती है
काश्मीर है जहां हमारा राष्ट्रगान शम्रिंदा है
भारत मां को गाली देकर भी खलनायक जिन्दा है
काश्मीर है जहां देश का शीश झुकाया जाता है

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा


सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा
हम बुलबुले है इसकी ये गुलसिता हमारा ॥धृ॥

घुर्बत मे हो अगर हम रहता है दिल वतन मे
समझो वही हमे भी दिल है जहाँ हमारा ॥१॥

परबत वो सब से ऊंचा हमसाय आसमाँ का
वो संतरी हमारा वो पासबा हमारा ।२॥

गोदी मे खेलती है इसकी हजारो नदिया
गुलशन है जिनके दम से रश्क-ए-जना हमारा ।३॥

ए अब रौद गंगा वो दिन है याद तुझको
उतर तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा ॥४॥

मझहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना
हिन्दवी है हम वतन है हिन्दोस्तान हमारा ॥५॥

युनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिल गये जहाँ से
अब तक मगर है बांकी नामो-निशान हमारा ॥६॥

कुछ बात है की हस्ती मिटती नही हमारी
सदियो रहा है दुश्मन दौर-ए-जमान हमारा ॥७॥

इक़्बाल कोइ मेहरम अपना नही जहाँ मे
मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहा हमारा ॥८॥

जय हिन्द जय भारत...!!