Thursday, October 18, 2012

मैं रोज नही मरना चाहता, एक बार भिड़ जाने दो



मैं रोज नही मरना चाहता,
बस एक बार भिड़ जाने दो
यूं रोज रोज डरना छोड़ो,
बस एक बार भिड़ जाने दो


एक सो बीस हम है और
एक सॊ पचास-साठ वो है
हे चीन, इतिहास शाक्षी है
जीत कद से नहीं ऊंचे हॊसले से है
सीमा विस्तार ही प्रव्रिती है तुम्हारी तो
हम भी इस भारत भू का दम भरते हैं


हे पाक काश्मीर-काश्मीर
क्यों चिल्लाता है, भूल गया क्या,
तू खुद तो भाग हमारा है
ये जानते हैं हम, ये जानते हैं हम.....
तू संयुक्त राष्ट्र के दम,
पर ही तो छ्लांग लगाता है।

इटली की मैड़म मैं तेरा क्या दोष धरूं
जब अपना ही प्रतिनिधि खोटा है
जिसने मैड़म से पैसा लेके
स्विस बैंक में खाता खोला है।
यों धोके से तुमने लूटा है
वोट, सांसद, विधायक तो क्या
खनिज़, बीज और ज़मीन को भी बेचा है।

अगर विचार लूट का है
तो लाल किले से ऐलान करो
अगर हममें भारत का खून है
तो हम जीत लेंगे.....
तुममे इटली के खून का गर्व हो,
तो तुम जीत.. लेना....!!

-------------------------------------------------------------------------   पटेल अरूण



Thursday, October 11, 2012

कभी कभी


कभी मासूम लगती हो,
कभी ज़ालिम सी लगती हो....

गंगा की धार लगती हो,
कभी सरोवर सी शांत लगती हो....

कभी एक खाब लगती हो,
कभी स्वयं प्रमाण लगती हो....

प्रत्यक्ष होके अप्रत्यक्ष लगती हो,
अप्रत्यक्ष होके प्रत्यक्ष सी लगती हो....

किसी असमंजस का हल लगती हो,
कभी खुद असमंजस का कारण लगती हो.....

                                                      -------------- पटेल अरुण

Tuesday, June 19, 2012

कृषक - kisaan per kavita


कड़ी कर्कट धूप और वो सूक्ष्म रास्ते
संकल्पशील मानस का संकल्प निहारते
ना जाने क्या दायित्व निभाने को आतुर
जैसे देश पालन-पोषण के बोने हो अंकुर

आज ठोस माटी की दृढ़ता का सामना
हल की नोक पर है, जान को झोकना
फ़िर बीज का थैला लै बुवाई करनी
फ़सल पर किस्मत की अगुवाई करनी

घोर अंधकार में चल रही बयार में
सूर्य से पूर्व आज उठ चले मैदान में
रास्ते के विघन कोहरे से है सामना
सर्द ऋतु में स्वेदजल से फ़सल सीचना

नि:स्वार्थ उपज को सुत समान पालते
हम गर्वित हो श्रमिको के श्रम को निहारते
बाद ताप के शाप, वर्षा ऋतु मी को तरसाती
मेघ-दूत के अधीन हो मेघ को निहारते

खेत अब वात से बात कर लहलहाते
तब वे निर्भय निडर हो खेत मे जागते
उग्र प्राणीयों से रखवाली मे रात गुजारते
मैं कवी हूं.. उन भूमीपुत्रो को नमन करता हूं

----------- पटेल अरूण स्वदेशानुरागी

गंगा हमसे करे पुकार....


गंगा हमसे करे पुकार....
मेरे देश वासीओं,
तुम पर ही उम्मीद टिकी है
ये उद्योग पती तो होस खो चुके
मुझे मलिन और मैली करते है

साधु-संत अनशन कर मरते है
कोइ ना उनकी सुनने वाला
तुम पर ही आस बंधी है
सरकार ने तो है, मुझे नकारा

मुझसी धरोहर क्यों खोते हो
उठो चलो आह्वान करो और
उन लोगो की संगत लो
जो मुझे बचाने को तत्पर है

पटेल अरूण स्वदेशानुरागी

अभी जंतर मंतर में किया है अब आगे रामलीला में होगा..... अधिक से अधिक संख्या मे पहुंचो

Sunday, June 10, 2012

मन करता है फ़ूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर,


मन करता है फ़ूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर,
भारत के बेटे शरणार्थी हो गए अपनी धरती पर
भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर की छाती पर
वे घाटी से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर
जिनकी नाक टिकी रहती है पाकिस्तानी जूतों पर
काश्मीर को बंट्वारे का धंधा बना रहे हैं वो
जुगनू को बैसाखी देकर चन्दा बना रहे हैं वो
फ़िर भी खून-सने हाथों को न्योता है दरबारों का
जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा हो अंधियारों का
काश्मीर है जहां देश के दिल की धड़कन रोती है
संविधान की जहां तीन सॊ सत्तर अड़चन होती है
काश्मीर है जहां दरिंदो की मनमानी चलती है
घर-घर में ए. के. छ्प्पन की राम कहानी चलती है
काश्मीर है जहां हमारा राष्ट्रगान शम्रिंदा है
भारत मां को गाली देकर भी खलनायक जिन्दा है
काश्मीर है जहां देश का शीश झुकाया जाता है

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा


सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा
हम बुलबुले है इसकी ये गुलसिता हमारा ॥धृ॥

घुर्बत मे हो अगर हम रहता है दिल वतन मे
समझो वही हमे भी दिल है जहाँ हमारा ॥१॥

परबत वो सब से ऊंचा हमसाय आसमाँ का
वो संतरी हमारा वो पासबा हमारा ।२॥

गोदी मे खेलती है इसकी हजारो नदिया
गुलशन है जिनके दम से रश्क-ए-जना हमारा ।३॥

ए अब रौद गंगा वो दिन है याद तुझको
उतर तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा ॥४॥

मझहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना
हिन्दवी है हम वतन है हिन्दोस्तान हमारा ॥५॥

युनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिल गये जहाँ से
अब तक मगर है बांकी नामो-निशान हमारा ॥६॥

कुछ बात है की हस्ती मिटती नही हमारी
सदियो रहा है दुश्मन दौर-ए-जमान हमारा ॥७॥

इक़्बाल कोइ मेहरम अपना नही जहाँ मे
मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहा हमारा ॥८॥

जय हिन्द जय भारत...!!

Sunday, May 6, 2012

चेहरा


जब रात तन्हाई छाती है
चेहरा मेरी प्रीयतमा का
यों दिखलाती है, ज्यों चांद निकलता बादल से

चेहरा उसका आते ही
तन्हाई तो धूमिल सी हो
शून्य क्षुद्र हो जाती है

यादों का चक्कर चलता है
मन घूम झूम हर्शित हो
बेधड़क धड़कने लगता है

तब निंद्रा बहुत सताती है
पास आते आते एक ओर हो
छिपकर कहीं निकल जाती है

थोड़ा स्वार्थपर मन होता है
वाद विवाद से एक तरफ़ हो
शयन-शैया पर सोना चाहता है

रात्रि का दूसरा पहर गुजरता है
तब मैं और रैन परस्पर बढ़ते है
साथ रात के पहरों का पहरा देते हैं

तब निंद्रा बहुत सताती है
पास आते आते एक ओर हो
छिपकर कहीं निकल जाती है

ऐसी आकुलता मे रात गुज़रती है
जैसे तर्क-वितर्क ही होते हो
ना हम सोते हो ना वो सोने देते हो

इस कदर कहर झेलना पढ़ता है
तब कही शोशण का पोषण करते
आंख हमारी लग जाती है

प्रतिरात्रि हमसे रात्रि यही खेल खेलती है
ना हम सोते है ना वो सोने देती है

---------पटेल अरूण स्वदेशानुरागी

Friday, March 30, 2012

टाट्रा ट्रक घोटाला

टाट्रा ट्रक घोटाला-
भारतीय थल सेना मे गहमागहमी है,
सभी बोल रहे है, मीडिया बोल रही है,
सेना प्रमुख और रक्षा मंत्री बोल रहे है,
सान्सद बोल रहे है, निलंबित हो रहे है,
किन्तु हमारे माननीय प्रधानमन्त्रि अब तक मोन रहे है.....
इस बात पर हैरान न होना मित्रो......
शायद उनको अब तक मेम साहब से आदेश ही नही मिले है।

क्यो


मुझे बता दो दोस्तो ऐसा क्यो हो रहा है... क्यो
जिस देश मे जन्म लेना ही भाग्यशाली माना जाता था,
आज उसी देश मे सारे अप्रवासी भारतीय बनना चाहते है क्यो....
ये वो देश है जिसमे विदेशी आकर शिक्षा पाने का स्वप्न देखते थे,
आज उसी देश के युवा बाहर जाके शिक्षा लेने पर गर्व महसूस करते है क्यो...
जिस देश मे जन्म लिया उसी देश को प्रतिभा पलायन जैसी दुविधा देते है क्यो....
दोस्तो क्यो..... !!
कुछ सोचो दोस्तो आखिर कमी है कहां.......

Sunday, March 11, 2012

एक दिन रुसवाई मे यारी को कोस रहे थे हम
हम और हमारा जाम, रात काट रहे थे हम
अचानक खालि हुई... बोतल ने समझाया कि
यारी नही ये तो वो इश्क है जिसके कारण रो रहे थे हम
बढ्ती मसरूफ़ियतो ने ऐसा दूर किया हमको
के अब सभी पहले जैसे हस खेल सकते नही
दिल से शूक्रिया अदा करते है facebook का
के अब जुदा होकर भी हम यारो से जुदा होते नही............
यारो साथ बैट कर मैखाने मे एक दिन पी रहे थे हम,
मदहोशी मे हमारी कुछ ऐसा हुआ,
एक पुराने गम ने पूछा क्या आप अब भि वही रहते है,
हमने कहा चले मत आना तुम्हे भुलाने के लिए अब हम यही रहते है/

Wednesday, February 8, 2012

ऐसे -जैसे

रात को तन्हाई भरे पलो मे मन जब कुच सोचता है
तो उसका चेहरा आखो़ के सामने ऐसे उभरता है
जैसे बाद्लो मे से चा़़द निकलता है,
मेरी रातो कि तन्हाई को इस तरह उडा जाता है
जैसे पानी अपनी रफ़्तार से क़कड बहा ले जाता है
और
बिना कुछ कहे सुने वो चेहरा ऐसे ओझल हो जाता है
जैसे पतझड मे पेडॊ से पत्ते ओर नूर ओझल हो जाता है

इश्क-ए-हाल

कोइ मुझसे पूछे जो गर, इश्क मे क्या हाल बना रखा है
तो कह दू उसे....
याद-ए-दिल, याद-ए-जिगर, याद-ए-तमन्ना लेकर
अपनी वीरान बहारो़ को सजा रखा है//

उनसे मिलने का दिन जो पास है

उनसे मिलने का दिन जो पास है,

ना जाने क्यो़ दिल आज थोडा उदास है,
कुछ पाने का या सब खोने का अहसास है/

उनसे मिलने का दिन जो पास है

दिल थोडा खुश और कहि़ ज्यादा उदास है,
यहि अजीब सि दुविधा अब मेरे पास है/

उनसे मिलने का दिन जो पास है

दोस्तो़ से नहि छिपता न जाने ये कैसा राज है,
दोस्तो़ से घिरे है मगर दिल मे़ उसिके साज है/

उनसे मिलने का दिन जो पास है
शायद प्यार बस यहि एक अहसास है/

Friday, January 13, 2012

अब तू बनि है

अब तू बनि है किसी और की जिद्गी का उन्वा,
अब तेरी राते़ उसकी बाहो़ मे़ बसी रहती है,
अब ना उस उल्फ़त की हकीकत बाकी,
फ़िर भी नादान दिल मे उम्मिदे़ बनि रहती है.

द्र्ख्वास्त

एक द्र्ख्वास्त ये दिल तुमसे करना चाहता है,
आति रहा करो मिलने जब तलक मुम्किन है,
क्यो़ ना तब तलक इश्क को अपने वजह मिलति रहे जीने को,

मलाल

इससे बड. कर मलाल शायरी मे़ क्या होगा,
लिखता हू़ जिसके लिये उसको गुमा़न ही नहि,
समझे मुझे सारा जहा़न तो भी क्या होगा,
गर ज़ज़्बा मेरा जिसके लिये उस पर अया़ ही नहि.

Thursday, January 5, 2012

प्रतीक्षा - हरिवंशराय बच्चन

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?

मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आने वाले,
पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले,
साँसें घूमघूम फिरफिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं,
मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता?

उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले,
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपने होश सम्हाले,
तारों की महफिल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से,
मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता?

बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती,
रगरग में चेतनता घुलकर, आँसू के कणसी झर जाती,
नमक डलीसा गल अपनापन, सागर में घुलमिलसा जाता,
अपनी बाँहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता?