रात को तन्हाई भरे पलो मे मन जब कुच सोचता है
तो उसका चेहरा आखो़ के सामने ऐसे उभरता है
जैसे बाद्लो मे से चा़़द निकलता है,
मेरी रातो कि तन्हाई को इस तरह उडा जाता है
जैसे पानी अपनी रफ़्तार से क़कड बहा ले जाता है
और
बिना कुछ कहे सुने वो चेहरा ऐसे ओझल हो जाता है
जैसे पतझड मे पेडॊ से पत्ते ओर नूर ओझल हो जाता है
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