जब रात तन्हाई छाती है
चेहरा मेरी प्रीयतमा का
यों दिखलाती है, ज्यों चांद निकलता बादल से
चेहरा उसका आते ही
तन्हाई तो धूमिल सी हो
शून्य क्षुद्र हो जाती है
यादों का चक्कर चलता है
मन घूम झूम हर्शित हो
बेधड़क धड़कने लगता है
तब निंद्रा बहुत सताती है
पास आते आते एक ओर हो
छिपकर कहीं निकल जाती है
थोड़ा स्वार्थपर मन होता है
वाद विवाद से एक तरफ़ हो
शयन-शैया पर सोना चाहता है
रात्रि का दूसरा पहर गुजरता है
तब मैं और रैन परस्पर बढ़ते है
साथ रात के पहरों का पहरा देते हैं
तब निंद्रा बहुत सताती है
पास आते आते एक ओर हो
छिपकर कहीं निकल जाती है
ऐसी आकुलता मे रात गुज़रती है
जैसे तर्क-वितर्क ही होते हो
ना हम सोते हो ना वो सोने देते हो
इस कदर कहर झेलना पढ़ता है
तब कही शोशण का पोषण करते
आंख हमारी लग जाती है
प्रतिरात्रि हमसे रात्रि यही खेल खेलती है
ना हम सोते है ना वो सोने देती है
---------पटेल अरूण स्वदेशानुरागी
wow...... fantastic !! nice lines
ReplyDeletethanks pankaj....
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