Saturday, May 23, 2015

उसकी तारीफ़ करू तो यों है कि

उसकी तारीफ़ करू तो यों है कि,

हर विशेषता का विश्लेषण कर,
एक एक अदा का गय्ण गाकर।

कहदूं सारे जहाँ से हां मेरी है वो...

जो....!!

कभी दिवानी कभी सयानी लगती है,
कस्तूरी बन वन महकाया करती है।

चंचल चितवन सुंदर सा यौवन,
पाया है उसने, देवी का सा मन।

बड़ी अनोखी गहरी सी आँखें,
घनी सी पलके पलपल झपकें।

गुलाबी अधरों से गुलाब शर्माये,
मुस्कान देख मन हर्शित होजाये।

बोले तो शब्दों में मिठास आजाये,
कटु स्वरों में भी प्रेम रस छाजाये।

ललाट पर अलोकिक सा तेज़ लिये,
आती है, तो सब कुछ रौशन किये।

हंसी  मधुर कपोलों पर देखकर ही,
जैसे आती हो मुस्कान फ़ूलों पर।

खिलते हैं सब फ़ूल जिसे देखकर,
ऐसा जादू करती है उन्हें छूकर।

उसके बालों का ही टौर देखकर,
आती हो घनी घटायें घनघोर कर।

चलती है इठलाकर कुछ बलखाकर,
नदियाँ भी चिड़ जाती हैं कतराकर।

चित्तचोर है, समंदर की हिलोर है,
मुझे उससे बांधे एक कच्ची डोर है।

डोर की रक्षा में सारी उर्जा लगाई है,
बस एक वो ही मेरे दिल पर छाई है।

No comments:

Post a Comment