आज कार्तिक माह की त्रिपुरारी पूर्णिमा वर्ष ५११६ का दिन है और इस दिन माँ गंगा के पवित्र और अदूषित जल प्रवाह में स्नान करने का आध्यात्मिक महत्व है। गढ़ मुक्तेश्वर तथा गंगा नदी के किनारे बसे कुछ गाँवो में इन दिनो धार्मिक श्रद्धा और उत्सव से भरा माहौल हर साल देखने को मिल जाता है। जिसका कारण है, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष में चलने वाला मेला जो आज के दिन पूरा होता है।
इन दिनो मैं उत्तर प्रदेश के हापुर जिले में रह रहा हूँ, जो यहाँ से बहुत अधिक दूरी पर नहीं है। यही बात थी या गंगा जी का बुलावा था कि बस मैने भी गंगा जी के दर्षन और स्नान का मन बना लिया। एक विचार और था मन में की आज तक कभी कोई मेला नहीं देखा है क्यों न मन में बने मेले के निर्जीव चित्रण को सजीव कर लिया जाये।
इन दिनो मैं उत्तर प्रदेश के हापुर जिले में रह रहा हूँ, जो यहाँ से बहुत अधिक दूरी पर नहीं है। यही बात थी या गंगा जी का बुलावा था कि बस मैने भी गंगा जी के दर्षन और स्नान का मन बना लिया। एक विचार और था मन में की आज तक कभी कोई मेला नहीं देखा है क्यों न मन में बने मेले के निर्जीव चित्रण को सजीव कर लिया जाये।
मेले का व्रितांत शुरु करते हूये ये बताना जरूरी है कि मेरे मन में मेले की छवी कुछ ऐसी थी के कुछ छोटे बड़े झूलों के साथ खाने पीने कि वस्तुऎं होंगी, इन्ही विचारों को मन में संजोये जब यात्रा शुरू की तो रेलगाड़ी से जाना ही उचित समझा।
गढ़ की ओर जाने वाली गाड़ी में चढ़ गये, अब गंगा जी के सबसे पास कौन सा स्टेश्न है, जहां उतरा जाये इसकी जानकारी नहीं थी तो साथ बैठे लोगों से पता चला कि एक जगह है ब्रजघाट जहां घाट बने हुये हैं और दूसरी जगह है गढ़ गांव से आगे जहां गंगा नदी बहती हैं। उसके किनारे पर मेला लगता है, मेरा लक्ष्य मेला था तो ब्रजघाट न चुन कर गढ़ उतरने का फ़ैसला किया। दो घण्टे के उमंग और कल्पना से व्याप्त रेल यात्रा के बाद एक ठैराव आया गढ़ स्टेशन आया और उतरते ही भीड़ के साथ साथ कब स्टेशन से बाहर निकला पता नहीं चला, सम्भलते ही सामने देखा तो एक चौड़ी सड़क थी पर गाड़ियों से भरी हुई थी। रास्ता ढूंढ़ते हुये कुछ दूर चला तो आगे सड़क पर एक मंदिर और द्वार था पुराने लोग ये बताते हैं कि कभी इस द्वार से कुछ दूरी पर हे जो ८५ सीडियां हैं उनके निकट से बहती थी माँ गंगा पर आज स्थिति कुछ ये है की गंगा जी यहां से तकरीबन ६ मील दूर हैं। अब आगे बढ़्ते हैं, सरकार की कोई योजना थी या स्थानिय लोगों की व्यवस्था हमें आगे की राह आसान लगने लगी क्योंकि ६ मील पैदल सुनकर तो थकान होने लगी थी पर मेले तक पहुंचने के लिये ट्रक्टर ट्रौली की सवारी थी उस पर चढ़ गये। अब आगे की राह ऐसी थी कि एक सकरी सी सड़क जिसके दोनों तरफ़ कुछ दूरी पर खेत थे। कुछ दूर चलते ही देखा कि मेले जाने वालों से ज्यादा भीड़ आने वालों की थी क्योंकि ये मेले का आखिरी दिन था। आने वाले लोगों में साइकल, मोटर साइकल, घुड़सवार, घोड़ा गाड़ी, बैल गाड़ी, कार, जीप अथवा ट्रैक्टर ट्रौली सभी शामिल थे और आने वालों की अधिकांश्ता के कारण जाने वालों को राह नहीं मिल पा रही थी। जैसे तैसे ४ मील की यात्रा ४० मिन में पूरी हो पायी जो शायद पैदल भी इतने ही समय में तय हो जाती। अब आगे मेले का एक धुंधला नज़ारा मिल रहा था। जिसमें बड़े बड़े झूले नज़र आ रहे थे जो रोमांच को बढ़ाने के लिये काफ़ी थे। पैदल आधा मील चलते ही मेले में प्रवेश हुआ और दृश्य ये था कि गंगा जी तक जाने के लिये कई गलियारे बने थे जिनके दोनो तरफ़ वहां रूकने वालों के तम्बू थे और आगे चलकर दुकाने थी तो तट जाने के लिये एक राह पकड़ी।
अब जो देखा वो कोई मंजिल पाने वाले भावों को पैदा करने वाला दृश्य था। जिसने रोमांच से रोंगटे खड़े कर दिये और सकारात्मक ऊर्जा से तन और मन में कंपन करदी गंगा जी के तट से विशाल गंगा जी को नमन करते हुये आंखे उठी तो बहुत दूर धुंधला सा एक दृश्य गंगा जी के दूसरे छोर पर देखा जहां बड़े बड़े पर थोड़े धुंधले गोल-गोल झूले जैसे इस तरफ़ थे वैसे हे दिख रहे थे। नदी के किनारे किनारे बहुत दूर तक तम्बू भी नज़र आ रहे थे। लोगों से पूछ्ने पर पता चला कि उस तरफ़ भी ऐसा ही मेला लगता है। जिसे तीगरी का मेला कहा जाता है, जो कि मुझे दिखाई दे रहा था की इस तरफ़ से भी कहीं अधिक विशाल और गूड़ है।
गंगा के किनारे किनारे गीली रेत पर निशान बनाते पांवो से लोगों की भीड़ से बचते हुये दूर चलने लगा और एक अनुकूल जगह देखकर गंगा जी में प्रवेश करने से पहले आशिर्वाद लेता हुआ पानी में उतर गया, समय दिन के तीसरे पहर का था जिस कारण ज्यादा ठिठुरन महसूस नहीं हूई। जब आधा शरीर पानी में चला गया तो सांस रोकते एक गोता लगाया और हर हर गंगे का जाप करते हुये जब उपर आया तो गंगा जी के पवित्र जल में सारे तन मन के पाप धुलने की अनुभूती का आनंद लेते हुये तकरीबन घण्टे भर नहाने के बाद सुर्य देव को नमस्कार करके गंगा जी की लहरों के प्रवाह से बाहर आया और सोंचा की अब चला जाये। कपड़े पहनते हुए याद आया कि एक और जरूरी काम है जो की सुर्य के ढ़लने के बाद ही करना है और पूरे कपड़े पहन कर जब नज़र घूमी तो एक बार फ़िर गंगा जी का उस पार तीगरी वाला मेला दिखा। ये विचार आया की उस तरफ़ कैसे जाया जाये।
इसी बीच एक बाबा जी सफ़ेद दाड़ी वाले विशाल शरीर के भगवा वस्त्र तथा माला धारण करे हुये नंगे पाँव मेरी तरफ़ आते दिखे और आशिर्वाद देते हुये भिक्षा की उपेक्षा की जैसा कि सभी करते हैं। वे मुझे आशिर्वाद के साथ साथ एकमुखी रूद्राक्ष भी देना चाहते थे उनके हांथ में एक ड्ब्बा दिखा जिसमें और भी अध्यात्मिक वस्तुऎं थी। मुझे रूद्राक्ष दिखाते हुये बोले बेटा ये लेले एक मुखी रूद्राक्ष बड़ा ही दुर्लभ है ये टहनी लगा हुआ है वास्तव में उस रूद्राक्ष पर टहनी थी जो के पेड़ से टूट्ते समय उस पर लगी रह गयी होगी। मैंने नज़र उनके डब्बे पर गड़ाई हुई थी, जिसमें से एक पंचमुखी रूद्राक्ष उठाकर कहा बाबा जी मुझे ये भी चाहिये। बोले ले ले बेटा और मैंने उन्हें कुछ द्क्षिणा दी तो बोले इतने में तो बेटा जी ये दुर्लभ एकमुखी नहीं मिलेगा। तुम चाहो तो पंचमुखी रख लो मैने भी संतुष्टी के भाव को प्रकट करते हुये, वही रूद्राक्ष रख लिया और उनसे पूछा बाबा जी उस पार कैसे जायें। उन्होंने अपने हांथ को उठाते हुये अपनी मोटी मोटी उंगलियों से इशारा करते हुये नाव के टिकट लेने का स्थान दिखाया और मैंने हांथ जोड़कर उनसे विदा ली। इस तरफ़ पता चला कि उस तरफ़ कैसे जाया जाये। आगे कि ओर बढ़्ने लगा अघले ही कुछ क्षड़ों में मैं एक नाव में बैठा था और मैंने देखा कि उसी नाव में कुछ दूर वही बाबा जी भी बैठे हैं खैर मैं इस नांव की यात्रा का आनंद ले रहा था। मैंने डूबते सूर्य की किरणों और किसी नदी की लहरों को एक साथ नहीं देखा था। डूबते सूर्य की उज्ज्वल किरणें गंगा के जल में स्नान करके चमचमाती हुई सुनहरी-सुनहरी बड़ी चित्ताकर्षक लग रही थीं। ये देखकर मैंने मेरे मन में एक और छवी को सजीव करते हुये दो चार तस्वीरें ली।
देखते देखते ही गंगा जी का दूसरा छोर आ गया और उतरते समय बाबा जी ने फ़िर एक बार चलते चलते घेरा और एक मुखी रूद्राक्ष दिखाते हुये बोले "ले ले बेटा किस्मत बदल जायेगी" मैंने सोचा कि चलो ले ही लेते हैं कहते हैं आज के दिन किया गया दान पूण्य कई गुना होकर मिलता है, बाकी किस्मत बदलने का ऐसा कोई लोभ था नहीं। ये सोंचते हुये मैंने बाबा जी को कुछ और दक्षिणा देते हुये वो ले लिया और आगे चलते चलते बातों में पता चला कि वो रुद्रपुर, उत्तराखण्ड के एक मंदिर के पुजारी हैं और यहां गंगा नहाने आये हैं। जाते जाते उन्होंने एक बार फ़िर अपने दिये एकमुखी रूद्राक्ष को याद किया और कहा बेटा ये तेरी ही किस्मत में था बोले बेटे इसे मंदिर में सिंदूर की डिब्बी में रखना सुनकर गर्दन हिलाकर रज़ामंदी दिखाते हुये मैंने एक बार फ़िर हांथ जोड़ कर उनसे विदा ली और आगे मेले में घूमने लगा तो पाया कि इस ओर (तीगरी) और उस ओर(गढ़) के मेले में बहुत ज्यादा फ़र्क है और वो ये है कि इस तरफ़ आने वाले लोग तीगरी, गज्रौला, अम्रोहा, मोरादाबाद, रामपुर, बरेली और उत्तराखण्ड के जिलों के लोग थे जो कि गांव और ज़मीन से जुड़े लोग थे। जबकी उस तरफ़ हापुड़, गाजियाबाद, दिल्ली गुड़्गांव फ़रीदाबाद के लोग थे, जो कि शहरी लोग थे और इस बात को मैं इतने निश्चित तौर पर इसलिये कह सकता हूं क्योंकि आते समय उस सकरी सी सड़क पर मेले से वापस आती हुई कारों पर इन्हीं जिलो के पंजीक्रित नंम्बर(HR 26,HR 51..) मौजूद थे। तो शहर और गांव के इस मेले में गांव का मेला मुझे ज्यादा लुभावना और गहरी अध्यात्मिकता प्रकट करता लगा। ये सोंचकर मन में एक संतुष्टी हुई के चलो शाम का जो जरूरी और पूण्य का काम है, उसके लिये ये जगह ज्याद अनुकूल है।
इतने में शाम भी डल चुकी थी अंधेरा हो गया था और एक तरफ़ से पूनम(पूर्णिमा) का पूरा चांद सूर्य से रोशनी लेता हुआ सुर्ख लाल रंग का चढ़ने लगा। यही सब देख
ते हुये मैं वापस गंगा जी के तट की ओर बढने लगा। एक पंडित जी के पास जाकर अपनी इच्छा ज़ाहिर की कि पंडित जी मुझे दीप जला कर बहाने हैं, इस बात का ये महत्व है कि जिस साल ये मेला लगता है उसी वर्ष अगर घर में किसी का देहांत हुया है, तो उनके नाम का दिया गंगा जी में बहाया जाता है। तो पण्डित जी को अपनी माता जी के बारे में जानकारी देते हुये मंत्रोच्चारण के साथ साथ दो दीप प्रज्वलित किये और गंगा माँ के पवित्र पानी पे अपनी मां और पित्रों को याद करते हुये बहा दिये। गंगा जी का आशिर्वाद लेकर पानी से बाहर आते हुये अखिरी प्रणाम गंगा जी को किया और वापस अपने निवास स्थान कि ओर प्रस्थान किया।
इसी बीच एक बाबा जी सफ़ेद दाड़ी वाले विशाल शरीर के भगवा वस्त्र तथा माला धारण करे हुये नंगे पाँव मेरी तरफ़ आते दिखे और आशिर्वाद देते हुये भिक्षा की उपेक्षा की जैसा कि सभी करते हैं। वे मुझे आशिर्वाद के साथ साथ एकमुखी रूद्राक्ष भी देना चाहते थे उनके हांथ में एक ड्ब्बा दिखा जिसमें और भी अध्यात्मिक वस्तुऎं थी। मुझे रूद्राक्ष दिखाते हुये बोले बेटा ये लेले एक मुखी रूद्राक्ष बड़ा ही दुर्लभ है ये टहनी लगा हुआ है वास्तव में उस रूद्राक्ष पर टहनी थी जो के पेड़ से टूट्ते समय उस पर लगी रह गयी होगी। मैंने नज़र उनके डब्बे पर गड़ाई हुई थी, जिसमें से एक पंचमुखी रूद्राक्ष उठाकर कहा बाबा जी मुझे ये भी चाहिये। बोले ले ले बेटा और मैंने उन्हें कुछ द्क्षिणा दी तो बोले इतने में तो बेटा जी ये दुर्लभ एकमुखी नहीं मिलेगा। तुम चाहो तो पंचमुखी रख लो मैने भी संतुष्टी के भाव को प्रकट करते हुये, वही रूद्राक्ष रख लिया और उनसे पूछा बाबा जी उस पार कैसे जायें। उन्होंने अपने हांथ को उठाते हुये अपनी मोटी मोटी उंगलियों से इशारा करते हुये नाव के टिकट लेने का स्थान दिखाया और मैंने हांथ जोड़कर उनसे विदा ली। इस तरफ़ पता चला कि उस तरफ़ कैसे जाया जाये। आगे कि ओर बढ़्ने लगा अघले ही कुछ क्षड़ों में मैं एक नाव में बैठा था और मैंने देखा कि उसी नाव में कुछ दूर वही बाबा जी भी बैठे हैं खैर मैं इस नांव की यात्रा का आनंद ले रहा था। मैंने डूबते सूर्य की किरणों और किसी नदी की लहरों को एक साथ नहीं देखा था। डूबते सूर्य की उज्ज्वल किरणें गंगा के जल में स्नान करके चमचमाती हुई सुनहरी-सुनहरी बड़ी चित्ताकर्षक लग रही थीं। ये देखकर मैंने मेरे मन में एक और छवी को सजीव करते हुये दो चार तस्वीरें ली।
देखते देखते ही गंगा जी का दूसरा छोर आ गया और उतरते समय बाबा जी ने फ़िर एक बार चलते चलते घेरा और एक मुखी रूद्राक्ष दिखाते हुये बोले "ले ले बेटा किस्मत बदल जायेगी" मैंने सोचा कि चलो ले ही लेते हैं कहते हैं आज के दिन किया गया दान पूण्य कई गुना होकर मिलता है, बाकी किस्मत बदलने का ऐसा कोई लोभ था नहीं। ये सोंचते हुये मैंने बाबा जी को कुछ और दक्षिणा देते हुये वो ले लिया और आगे चलते चलते बातों में पता चला कि वो रुद्रपुर, उत्तराखण्ड के एक मंदिर के पुजारी हैं और यहां गंगा नहाने आये हैं। जाते जाते उन्होंने एक बार फ़िर अपने दिये एकमुखी रूद्राक्ष को याद किया और कहा बेटा ये तेरी ही किस्मत में था बोले बेटे इसे मंदिर में सिंदूर की डिब्बी में रखना सुनकर गर्दन हिलाकर रज़ामंदी दिखाते हुये मैंने एक बार फ़िर हांथ जोड़ कर उनसे विदा ली और आगे मेले में घूमने लगा तो पाया कि इस ओर (तीगरी) और उस ओर(गढ़) के मेले में बहुत ज्यादा फ़र्क है और वो ये है कि इस तरफ़ आने वाले लोग तीगरी, गज्रौला, अम्रोहा, मोरादाबाद, रामपुर, बरेली और उत्तराखण्ड के जिलों के लोग थे जो कि गांव और ज़मीन से जुड़े लोग थे। जबकी उस तरफ़ हापुड़, गाजियाबाद, दिल्ली गुड़्गांव फ़रीदाबाद के लोग थे, जो कि शहरी लोग थे और इस बात को मैं इतने निश्चित तौर पर इसलिये कह सकता हूं क्योंकि आते समय उस सकरी सी सड़क पर मेले से वापस आती हुई कारों पर इन्हीं जिलो के पंजीक्रित नंम्बर(HR 26,HR 51..) मौजूद थे। तो शहर और गांव के इस मेले में गांव का मेला मुझे ज्यादा लुभावना और गहरी अध्यात्मिकता प्रकट करता लगा। ये सोंचकर मन में एक संतुष्टी हुई के चलो शाम का जो जरूरी और पूण्य का काम है, उसके लिये ये जगह ज्याद अनुकूल है।
इतने में शाम भी डल चुकी थी अंधेरा हो गया था और एक तरफ़ से पूनम(पूर्णिमा) का पूरा चांद सूर्य से रोशनी लेता हुआ सुर्ख लाल रंग का चढ़ने लगा। यही सब देख
ते हुये मैं वापस गंगा जी के तट की ओर बढने लगा। एक पंडित जी के पास जाकर अपनी इच्छा ज़ाहिर की कि पंडित जी मुझे दीप जला कर बहाने हैं, इस बात का ये महत्व है कि जिस साल ये मेला लगता है उसी वर्ष अगर घर में किसी का देहांत हुया है, तो उनके नाम का दिया गंगा जी में बहाया जाता है। तो पण्डित जी को अपनी माता जी के बारे में जानकारी देते हुये मंत्रोच्चारण के साथ साथ दो दीप प्रज्वलित किये और गंगा माँ के पवित्र पानी पे अपनी मां और पित्रों को याद करते हुये बहा दिये। गंगा जी का आशिर्वाद लेकर पानी से बाहर आते हुये अखिरी प्रणाम गंगा जी को किया और वापस अपने निवास स्थान कि ओर प्रस्थान किया।
इस यात्रा से एक ज्ञान ये मिला कि किसी भी यात्रा में एक सुनियोजित योजना का होना बहुत आवश्यक है। यदी वह यात्रा आध्यात्म से कोई रिश्ता रखती है तो ये बहुत जरूरी हो जाता है कि आप वहां के सभी रीती रिवाजों, धार्मिक तथ्यों तथा भौतिक महत्वों की पहले से ही जानकारी लेकर जायें जिससे आप की यात्रा और सफ़ल हो सकती है साथ ही आप सभी धार्मिक कृत्यों को समय और रीति के अनुसार कर भी सकेंगे।

Heart touching
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