मर मर कर जीते हैं, मर मर कर जीना होगा
अगर नहीं जागे तो, अत्याचारों को सहना होगा
आज उर मेरा अस्थिर है, भारत का एक हिस्सा अस्थिर है
एक नहीं, दो नहीं, नौ-नौ गोलों से विदीर्ण हूई मेरी धरती है
हम अंधे बहरे बने रहे, हिन्दू हम आपस में कटे मरे
भारत माता लज्जित रहे, और विधर्मी हमपर राज करे
धधक धधक कर जलती माता, आज अग्नि से झुलसती माता
और लज्जा का एक भावमात्र तक न किसी मस्तक पर आता
हम भाई-भाई कहलाने का एक तरफ़ा विचार करे
वो छाती पर वार करे और हम बैठे बस दुराचार का दीद करे
कट्टर कहाते हम घबराते, माताओं का दूध लजाते
तिलक लगाते हम शरमाते, दूर बैठ कर बस बतियाते
प्राणों की अंतिम आहुती देकर, भारत मां को पूर्ण स्वतंत्र करें
वर्षों से जलती छाती को अब बैरी का लहू चढ़ा कर शांत करें
आज उर मेरा अस्थिर है, भारत का एक हिस्सा अस्थिर है
एक नहीं, दो नहीं, नौ-नौ गोलों से विदीर्ण हूई मेरी धरती है
------ पटेल अरूण स्वदेशानुरागी
अगर नहीं जागे तो, अत्याचारों को सहना होगा
आज उर मेरा अस्थिर है, भारत का एक हिस्सा अस्थिर है
एक नहीं, दो नहीं, नौ-नौ गोलों से विदीर्ण हूई मेरी धरती है
हम अंधे बहरे बने रहे, हिन्दू हम आपस में कटे मरे
भारत माता लज्जित रहे, और विधर्मी हमपर राज करे
धधक धधक कर जलती माता, आज अग्नि से झुलसती माता
और लज्जा का एक भावमात्र तक न किसी मस्तक पर आता
हम भाई-भाई कहलाने का एक तरफ़ा विचार करे
वो छाती पर वार करे और हम बैठे बस दुराचार का दीद करे
कट्टर कहाते हम घबराते, माताओं का दूध लजाते
तिलक लगाते हम शरमाते, दूर बैठ कर बस बतियाते
प्राणों की अंतिम आहुती देकर, भारत मां को पूर्ण स्वतंत्र करें
वर्षों से जलती छाती को अब बैरी का लहू चढ़ा कर शांत करें
आज उर मेरा अस्थिर है, भारत का एक हिस्सा अस्थिर है
एक नहीं, दो नहीं, नौ-नौ गोलों से विदीर्ण हूई मेरी धरती है
------ पटेल अरूण स्वदेशानुरागी
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